कभी शराब का विज्ञापन मना करके ठुकरा दिए थे 50 लाख, ऐसी है सुशील कुमार के अर्श से फर्श की कहानी

भारतीय पहलवान सुशील कुमार को हत्या के आरोप में रविवार को गिरफ्तार कर लिया गया। सुशील भारतीय खेल इतिहास के एक बेहतरीन एथलीट रहे हैं। उन्होंने कई बार भारत का नाम रोशन किया। यही नहीं दो बार ओलंपिक मेडल जीतकर लाखों युवा पहलवानों के आदर्श बने। फिर अचानक एक घटना ने सुशील को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। आइए पढ़ें सुशील कुमार के अर्श से फर्श तक पहुंचने की कहानी।

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कानपुर (इंटरनेट डेस्क)। रेसलर सुशील कुमार का जन्म नजफगढ़ के छोटे से गांव बपरोला में हुआ था। उनके पिता दीवान सिंह एमटीएनएल दिल्ली में ड्रावर थे जबकि मां कमला देवी हाउस वाइफ थी। सुशील को उनके पिता, जो खुद एक पहलवान थे और उनके चचेरे भाई संदीप ने कुश्ती को अपनाने के लिए प्रेरित किया था। संदीप ने बाद में प्रतिस्पर्धा करना बंद कर दिया क्योंकि परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि दो पहलवानों को जरूरी खुराक दी जा सके। ऐसे में सुशील को डिब्बाबंद दूध, घी और ताजी सब्जियां दी जाती थी ताकि वह और ताकतवर बन सके और रेसलिंग में अपना नाम कमाएं।

14 साल की उम्र में शुरु की रेसलिंग
सुशील कुमार ने 14 साल की उम्र में छत्रसाल स्टेडियम के अखाड़े में पहलवानी में ट्रेनिंग लेना शुरू किया। उन्हें अखाड़े में यशवीर और रामपाल ने शुरुआती प्रशिक्षण दिया, बाद में अर्जुन पुरस्कार विजेता सतपाल और फिर भारतीय रेलवे शिविर में ज्ञान सिंह और राजकुमार बैसला गुर्जर द्वारा ट्रेनिंग दी गई। फ्रीस्टाइल कुश्ती में स्विच करने के बाद सुशील को पहली सफलता 1998 में विश्व कैडेट खेलों में मिली, जहां उन्होंने अपने भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता, इसके बाद 2000 में एशियाई जूनियर कुश्ती चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 2003 में जूनियर प्रतियोगिताओं से बाहर निकलते हुए कुमार एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में आए, जहां उन्होंने कांस्य पदक और राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

ओलंपिक मेडल जीतकर रचा इतिहास
रेसलर सुशील कुमार को पहली बड़ी सफलता 2008 ओलंपिक में मिली। जब पहलवान ने बीजिंग ओलंपिक में 66 किग्रा वर्ग में ब्रांज मेडल जीता। इसके बाद 2010 में, मास्को में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में सुशील कुश्ती में विश्व खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने 66 किग्रा वर्ग के साथ अच्छी शुरुआत की और रूस के अपने पसंदीदा एलन गोगेव को हराया। 2010 में दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों में सुशील ने 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में हेनरिक बार्न्स को 7-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता।

कानपुर (इंटरनेट डेस्क)। रेसलर सुशील कुमार का जन्म नजफगढ़ के छोटे से गांव बपरोला में हुआ था। उनके पिता दीवान सिंह एमटीएनएल दिल्ली में ड्रावर थे जबकि मां कमला देवी हाउस वाइफ थी। सुशील को उनके पिता, जो खुद एक पहलवान थे और उनके चचेरे भाई संदीप ने कुश्ती को अपनाने के लिए प्रेरित किया था। संदीप ने बाद में प्रतिस्पर्धा करना बंद कर दिया क्योंकि परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि दो पहलवानों को जरूरी खुराक दी जा सके। ऐसे में सुशील को डिब्बाबंद दूध, घी और ताजी सब्जियां दी जाती थी ताकि वह और ताकतवर बन सके और रेसलिंग में अपना नाम कमाएं।

14 साल की उम्र में शुरु की रेसलिंग
सुशील कुमार ने 14 साल की उम्र में छत्रसाल स्टेडियम के अखाड़े में पहलवानी में ट्रेनिंग लेना शुरू किया। उन्हें अखाड़े में यशवीर और रामपाल ने शुरुआती प्रशिक्षण दिया, बाद में अर्जुन पुरस्कार विजेता सतपाल और फिर भारतीय रेलवे शिविर में ज्ञान सिंह और राजकुमार बैसला गुर्जर द्वारा ट्रेनिंग दी गई। फ्रीस्टाइल कुश्ती में स्विच करने के बाद सुशील को पहली सफलता 1998 में विश्व कैडेट खेलों में मिली, जहां उन्होंने अपने भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता, इसके बाद 2000 में एशियाई जूनियर कुश्ती चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 2003 में जूनियर प्रतियोगिताओं से बाहर निकलते हुए कुमार एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में आए, जहां उन्होंने कांस्य पदक और राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

ओलंपिक मेडल जीतकर रचा इतिहास
रेसलर सुशील कुमार को पहली बड़ी सफलता 2008 ओलंपिक में मिली। जब पहलवान ने बीजिंग ओलंपिक में 66 किग्रा वर्ग में ब्रांज मेडल जीता। इसके बाद 2010 में, मास्को में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में सुशील कुश्ती में विश्व खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने 66 किग्रा वर्ग के साथ अच्छी शुरुआत की और रूस के अपने पसंदीदा एलन गोगेव को हराया। 2010 में दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों में सुशील ने 66 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में हेनरिक बार्न्स को 7-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता।

2012 में एक और ओलंपिक मेडल किया अपने नाम
2012 के लंदन ओलंपिक में, सुशील उद्घाटन समारोह में भारत के लिए ओलंपिक ध्वजवाहक थे। सुशील ने तत्सुहिरो योनेमित्सु के साथ अपना अंतिम दौर हारने के बाद रजत पदक जीता। वह कजाखस्तान के अक्जुरेक तनातारोव को हराकर भी विवादों में रहे थे। कजाख एथलीट ने सुशील द्वारा काटे जाने की शिकायत की, लेकिन बाद में उन्होंने इससे इनकार किया। 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में, सुशील कुमार ने कमर अब्बास को 74 किलोग्राम में हराकर स्वर्ण पदक जीता। 2018 राष्ट्रमंडल खेल, ऑस्ट्रेलिया शुशील ने फाइनल में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्स बोथा को हराकर स्वर्ण पदक हासिल किया।

ठुकरा दिया था 50 लाख का विज्ञापन
रेसलिंग में नाम कमाने के बाद सुशील कुमार भारत के स्पोर्ट्स आइकन बन गए। उन्हें तमाम विज्ञापन मिले। वह कई मशहूर कंपनियों का एड करते हैं। हालांकि इस बीच उन्हें एक शराब कंपनी का एड करना था, जिसके लिए सुशील को 50 लाख रुपये मिलने थे। मगर पहलवान ने उसे यह कहते हुए ठुकरा दिया कि वह एल्कोहल का प्रचार नहीं करेंगे। इससे युवाओं पर बुरा असर पड़ता है। सुशील के इस कदम की कई लोगों ने तारीफ की।

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