DNA Analysis: Ground report of India and Nepal’s relation | DNA Analysis: भारत-नेपाल के रिश्तों में आई चीन की ‘दीवार’ को गिराने वाली ग्राउंड रिपोर्ट

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नई दिल्ली: कुछ दिन पहले हमने आपको बताया था कि किस तरह चीन, पाकिस्तान और नेपाल के साथ भारत के रिश्ते लॉकडाउन में चले गए हैं. एक तरफ लद्दाख में भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद अब तक पूरी तरह नहीं सुलझा है. दूसरी तरफ पाकिस्तान, कश्मीर के इलाकों में लगातार गोलीबारी कर रहा है. और अब नेपाल के साथ भी भारत के रिश्तों में दरार बढ़ रही है. लेकिन इस बात में तो कोई शक ही नहीं है कि भारत और नेपाल के बीच नक्शे से जुड़े इस पूरे विवाद के केंद्र में चीन है. जिसने इस विवाद की स्क्रिप्ट भी तैयार की है और नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. ओली के हर एक्शन का निर्देशन भी चीन ही कर रहा है. 

शनिवार को नेपाल की संसद में विवादित नक्शे में संशोधन का प्रस्ताव पास हो गया. नए नक्शे में भारत के तीन हिस्से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पिया-धुरा को शामिल किया गया है. दिलचस्प बात ये है कि नेपाल की सभी विपक्षी पार्टियों ने भी इस नक्शे का समर्थन किया है. 275 सदस्यों वाली नेपाल की संसद में इस विवादित नक्शे के पक्ष में 258 वोट पड़े. दरअसल के.पी. ओली ने नए नक्शे के विषय को राष्ट्रवाद के नाम पर पेश किया. और फिर नेपाल की एकता और अखंडता के नाम पर संसद में दो तिहाई बहुमत से विधेयक को पास भी करवा लिया.

के.पी ओली के इस कदम को विशेषज्ञ चीन की साजिश के तौर पर देख रहे हैं जो नेपाल को जिओ पोलिटिकल सुसाइड (Geo-Political Suicide) के लिए उकसा रहा है. वैसे भी के.पी. ओली, भारत विरोधी रूख के लिए जाने जाते हैं. वो नेपाल की संप्रभुता और राष्ट्रवाद की मार्केटिंग करके भारत के खिलाफ चीन का एजेंडा चला रहे हैं.

लेकिन इस पूरे विवाद पर नेपाल की आम जनता क्या सोचती है? क्या भारत के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रखने वाले नेपाल के लोग भी अपनी सरकार के इस फैसले से संतुष्ट हैं?

यही जानने के लिए Zee News की टीम उत्तर प्रदेश के सोनौली पहुंची. इस इलाके में भारत और नेपाल की सीमा आपस में मिलती है. यानी ये भारत और नेपाल के बीच बॉर्डर का इलाका है.

भारत का महाराजगंज जिला और नेपाल का रुपन्देही जिला इस सीमा से जुड़े हुए हैं. ये सीमा, भारत नेपाल के बीच व्यापार का बड़ा केंद्र है. जहां हजारों की संख्या में नेपाल के लोग काम-काज के सिलसिले में भारत आते हैं. सोनौली बॉर्डर पर पहुंचकर, सबसे पहले Zee News की टीम ने एक खास बात नोट की.

पिछले कुछ महीनों से भारत और नेपाल सीमा पर नेपाल पुलिस, अस्थाई टेंट्स बनाकर उनमें रह रही है. इन टेंट्स पर चीनी भाषा के शब्द अंकित हैं. नेपाल पुलिस के अधिकारियों के मुताबिक, ये टेंट्स, कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए नेपाल को चीन से राहत के तौर पर मिले हैं. लेकिन जानकार मानते हैं कि इसके पीछे भी चीन की साजिश है, जो भारत और नेपाल सीमा पर अपना प्रोपगेंडा चला रहा है. चीन ये बताना चाहता है कि वो नेपाल के रास्ते भी भारत की सीमा तक पहुंच सकता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक हर पांच सौ मीटर की दूरी पर नेपाल पुलिस द्वारा ऐसे टेंट लगाए गए हैं.

ये इस बात का इशारा है कि भारत और नेपाल की दोस्ती के बीच दीवार बनने के लिए चीन कितनी शिद्दत से जुटा हुआ है. और नेपाल की सरकार भी चीन की कठपुतली बनी हुई है. लेकिन क्या नेपाल, भारत से संबंध बिगाड़ने का जोखिम उठा सकता है. क्या चीन, भारत और नेपाल के सदियों पुराने, रोटी-बेटी के रिश्तों के बीच आ सकता है? इस बात को सबसे बेहतर कोई बता सकता है, तो वो है खुद नेपाल की जनता. 

भारत-नेपाल मैत्री संघ के एस.बी. गुप्ता का कहना है कि रोटी-बेटी का संबंध कोई भी चाहे तोड़ नहीं सकता. वहीं नेपाली नागरिक मोहनलाल ने कहा कि आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं, किसी देश की हिम्मत नहीं है कि नेपाल और भारत के बीच दरार ला सके.

केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत-नेपाल का रिश्ता रोटी-बेटी का है. दुनिया की कोई भी ताकत इस रिश्ते को तोड़ नहीं सकती.

ये सिर्फ कहने की बात नहीं है, नक्शे पर खींची गईं चंद लकीरें भारत और नेपाल के इस रिश्ते में दरार पैदा नहीं कर सकतीं. अगर किसी को कोई शक हो तो भारत-नेपाल बॉर्डर पर जाकर देख ले. पता चल जाएगा कि चीन चाहे जितनी मर्जी कोशिश कर ले, जनम-जनम के इस रिश्ते को सात जन्मों में भी नहीं तोड़ पाएगा.

आपको बता दें कि भारत और नेपाल के बीच करीब 1800 किलोमीटर की सीमा है. दोनों देशों के लोगों के दिलों की तरह ये सीमा भी, पूरी तरह खुली हुई है. चीन के बहकावे में आकर नेपाल की सरकार ने नक्शे में तो बदलाव कर दिए, लेकिन इससे वो दोनों देशों के लोगों के दिलों में दूरियां पैदा नहीं कर सकती. 

नया नक्शा जारी करने के पीछे नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली के दिमाग में क्या चल रहा है, ये तो वो ही जानें. लेकिन नेपाल के लोगों के मन में क्या चल रहा है, ये समझने में वो बड़ी भूल कर रहे हैं. उन्हें भी एक बार भारत-नेपाल बॉर्डर का चक्कर लगा लेना चाहिए. और देख लेना चाहिए कि भारत और नेपाल का रिश्ता, किसी स्वार्थ से नहीं बना है. संस्कृति के धागों में पिरोया गया ये रिश्ता रोटी-बेटी के संबंधों से अटूट है. जिसे कोई सरकार या कोई देश चाहकर भी नहीं तोड़ सकता. 

नेपाल की सरकार को पता नहीं क्यों ये भ्रम हो गया है कि भारत से ज्यादा चीन, उसका सगा है. सच्चे रिश्ते वही होते हैं, जो निस्वार्थ होते हैं. चीन से रिश्तेदारी नेपाल को अस्थाई फायदे भले ही पहुंचा सकती है. लेकिन भारत से रिश्ते खत्म करना, ना तो नेपाल की सरकार के बस की बात है और ना नेपाल के नागरिक ऐसा कभी सोच सकते हैं.

भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर कई गांव बसे हैं. नेपाल के किसान भारतीय क्षेत्र में खेती करते हैं तो कुछ भारतीय क्षेत्र के किसान, नेपाल क्षेत्र में रहकर व्यापार करते हैं और शाम को अपने घर चले आते हैं. नेपाल के छात्र, भारत में पढाई करते हैं. नेपाल तो छोड़िए, चीन का किसी भी देश के साथ ऐसा रिश्ता ना कभी रहा है, और ना कभी रह सकता है. भारत और नेपाल सिर्फ पड़ोसी नहीं हैं, बल्कि सुख-दुख के सच्चे साथी हैं.



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