Success Story Of IAS Topper Jatin Kishore

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Success Story Of IAS Topper Jatin Kishore: यूपीएससी सीएसई परीक्षा एक ऐसा एग्जाम है जिसमें अच्छे से अच्छा कैंडिडेट भी एक सफलता के लिए तरसता है. वहीं जतिन जैसे कैंडिडेट्स भी होते हैं जो जिस क्षेत्र में जाते हैं, वहीं न केवल सफल होते हैं बल्कि टॉप भी करते हैं. वो भी तुलनात्मक कम समय में. जतिन ने पहले ही प्रयास में यूपीएससी द्वारा कंडक्ट की जाने वाली इंडियन इकोनॉमिक सर्विस में पहली रैंक के साथ टॉप किया था और दूसरे ही प्रयास में यूपीएससी सीएसई परीक्षा में दूसरी रैंक के साथ टॉप किया. साल 2018 के पहले प्रयास में जतिन का प्री में ही नहीं हुआ था. अपने पहले प्रयास की गलतियों को सुधारते हुए जतिन ने दूसरे प्रयास में न केवल सफलता पायी बल्कि बहुत ही अच्छी रैंक भी लाए. दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिए इंटरव्यू में जतिन ने परीक्षा की तैयारी से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की. जानते हैं विस्तार से.

इकोनॉमिक्स में महारत हासिल है जतिन को –

जतिन के लिए इकोनॉमिक्स विषय का खास महत्व है. उन्होंने इसी विषय से ग्रेजुएशन, पोस्टग्रेजुएशन किया है और जाहिराना तौर पर यही विषय उनका यूपीएससी में ऑप्शनल विषय भी बना. चूंकि वे इस क्षेत्र में काफी नॉलेज रखते हैं इसलिए उनके लिए इस विषय को हैंडल करना कठिन नहीं था.

जतिन की एक और खास बात यह है कि उन्होंने ट्रेनिंग में रहकर दूसरी बार यूपीएससी परीक्षा दी और टॉप किया. इंडियन इकोनॉमिक सर्विस में हुए सेलेक्शन के बाद जतिन ने काम करना शुरू कर दिया था. अपने पहले अटेम्प्ट की सबसे बड़ी गलती जतिन मानते हैं प्री परीक्षा में कम प्रश्न अटेम्प्ट करना. वे कहते हैं कि उन्होंने केवल 70 के आसपास प्रश्न किए थे, जिसमें से कुछ गलत भी हुए होंगे और कुछ में निगेटिव मार्किंग हुई होगी इसलिए वे इसी चरण से बाहर हो गए.

यहां देखें जतिन किशोर द्वारा दिल्ली नॉलेज ट्रैक को दिया गया इंटरव्यू –

कम किताबें और बार-बार रिवीजन है लाभकारी –

दूसरे कैंडिडेट्स की तरह जतिन का भी यही मानना है कि इस परीक्षा में सफल होने के लिए कम से कम किताबें रखें और उनसे बार-बार रिवाइज करें. ये उनके लिए खासतौर पर लाभकारी है जिनके पास समय की कमी है, हालांकि जिनके पास समय हो तब भी उन्हें किताबें सीमित ही रखनी चाहिए वरना रिवीजन नहीं हो पाता.

दूसरी जरूरी बात जतिन नोट्स बनाने को मानते हैं. वे कहते हैं कि उन्होंने नोट्स नहीं बनाए थे लेकिन उनका अनुभव ये कहता है कि नोट्स बनाने से रिवीजन आसान हो जाता है. वे किताब में ही अंडरलाइन करते थे जिससे उन्हें बाद में समस्या हुई. यहां तक कि उन्होंने अपने सीनियर्स से नोट्स लेकर एंड में रिवीजन किया.

सिलेबस को देखकर न घबराएं –

जतिन कहते हैं कि जब भी कोई कैंडिडेट इस फील्ड में आने की सोचता है और पहले स्टेप में सिलेबस देखता है तो वहीं से घबरा जाता है. उसे लगता है कि इतनी किताबें और इतना कोर्स कैसे पढ़ेंगे. लेकिन इस मोमेंट पर परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि जैसा आपके साथ हो रहा है वैसा ही हर कैंडिडेट के साथ होता है. इसे लाइकली लें और धीरे-धीरे एक दिशा में तैयारी आगे बढ़ाएं. आप समय के साथ सब करना सीख जाएंगे और सब समझ में भी आने लगेगा.

आंसर राइटिंग पर तब आएं जब कुछ कंटेंट तैयार हो जाए –

जतिन बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि मेन्स परीक्षा में सफल होने के लिए आंसर राइटिंग बहुत जरूरी है लेकिन इसके लिए भड़भड़ाएं नहीं. पहले एक स्तर का कंटेंट तैयार कर लें तभी आंसर राइटिंग पर आएं. बिना कंटेंट के आप लिखेंगे क्या और उत्तरों में वैसे भी वजन नहीं आएगा. वे कहते हैं कि ट्रेनिंग के कारण उन्हें समय कम मिलता था और वे चाहकर भी बहुत आंसर राइटिंग नहीं कर पाते थे लेकिन सफलता के लिए आंसर राइटिंग प्रैक्टिस जरूरी है.

अब आते हैं इंटरव्यू पर. इसके लिए जतिन डैफ पर बहुत ध्यान देने के लिए कहते हैं. वे कहते हैं अगर डैफ को पूरी तरह तैयार कर लिया है और साक्षात्कार के दौरान आप कांफिडेंट हैं तो कोई कारण नहीं कि आपका इंटरव्यू अच्छा न जाए. अपने उत्तरों के प्रति पूरी ईमानदारी बरतें और जो है वही बताएं न कि कुछ अलग दिखाने की कोशिश करें. बोर्ड तुरंत पकड़ लेता है कि आप ब्लफ कर रहे हैं.

तैयारी के दौरान जो भी आपका सपोर्ट सिस्टम हो, उसके टच में रहें और उनसे समय-समय पर बात करते  रहें. परीक्षा की तैयारी के नाम पर खुद को आईसोलेट करना ठीक नहीं.

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